- शकील अख्तर
आज बात को डाइवर्ट करने के लिए कभी राहुल कभी लेफ्ट पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि इन्होंने अडानी का जहाज डूबोया। मगर आर्थिक क्षेत्रों में कहा जा रहा है कि नींव तो पहले ही कमजोर थी और फिर दूसरे के क्षेत्र में दखलंदाजी करने से और हिल गई। अभी तक अडानी बंदरगाह, खनन और दूसरे क्षेत्रों में थे। अंबानी दूसरे क्षेत्रों में। जिनमें मीडिया भी था। मगर मीडिया में अडानी का आना उनके लिए घातक हो गया। इसका संदेश स्पष्ट है। जो राहुल ने कहा कि हम कारपोरेट के विरोध में नहीं हैं। एक या दो पूंजीपतियों को सब कुछ सौंप देने के विरोध में हैं। देश में बहुत सारे उद्यमी हैं। जिन्होंने अपने खतरे उठाने के क्षमता, मेहनत और लगन से बड़े उद्योग खड़े किए हैं।
व्यापार में अगर घाटा हो जाए तो व्यापारी उबर आता है। लेकिन अगर साख चली जाए तो फिर वापस नहीं आती। और अगर गिरती साख में कोई कंधा लगाए सहारा दे तो वह भी चला जाता है। कहते हैं कि गई इज्जत वापस नहीं आती। एक बार गया पैसा आ सकता है। और यहां सवाल साख, इज्जत और विश्वसनीयता का है। अडानी का सब कुछ चला गया। अब संघ सरकार मीडिया चाहे जितना उबारने की कोशिश करे जहाज डूब गया है।
जनता इस बात को समझ रही है। पैसे की बात वह फौरन समझती है। इसलिए उसने एफपीओ में पैसा नहीं लगाया। मजबूर होकर अडानी को अपना एफपीओ वापस लेना पड़ा। बान्ड भी केन्सिल करना पड़ा। इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि जहाज डूब रहा है। मगर वित्त मंत्री जिनके उपर देश की अर्थ व्यवस्था की जिम्मेदारी है वे कह रही हैं कि पहली बार थोड़ी हुआ। अच्छा मतलब दूसरी बार या तीसरी बार हुआ है तो यह गलत नहीं है? जार्ज फर्नांडिस ने भी यही कहा था। वाजपेयी सरकार के मंत्री थे कि महिला का पेट चीरकर बच्चा पहली बार थोड़ी निकाला है! वे बड़े समाजवादी नेता थे। आज भी समाजवादी फर्नांडिस का महिमामंडन करते रहते हैं। सही है इन सब समाजवादियों ने मिलकर ही भाजपा को 1967 में गैर कांग्रेसवाद के नाम पर सामाजिक स्वीकृति दिलवाई। और फिर 1977 में उनके साथ केन्द्र में सरकार बनाई। कहानी लंबी है। मगर संक्षेप में वीपी सिंह के साथ और फिर अन्ना हजारे के साथ मिलकर प्रतिक्रियावाद को ऐसा मजबूत किया कि आज उनका समाजवाद तो कहीं नहीं है मगर अडानीवाद छा गया।
लोहिया, जयप्रकाश, फर्नांडिस के समाजवाद का जिक्र आता है तो बताना पड़ता है कि जिस भाजपा को वे अपने कंधों पर उठाकर यहां तक लाए उसने ताकत पाने के बाद इन्हें इनकी सही जगह दिखाई। नीतीश कुमार से लेकर शरद यादव तक सब अपमानित होकर ही एनडीए से बाहर निकले हैं। लेकिन कांग्रेस में जिसे खत्म करने के लिए ही इन्होंने भाजपा को कंधे पर उठाया था समाजवादियों को खूब लाड़ प्यार मिला। इतना कि कांग्रेस के सबसे बड़े पदों महासचिव, मीडिया चेयरमेन पर बैठकर ये नेहरू, दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के खिलाफ बोलते थे। काम करते थे। 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ऐसे ही नहीं गई। कांग्रेसियों ने ही उसे अंदर से खोखला कर दिया था। इतना कमजोर कि एक अन्ना हजारे जैसे नकली आंदोलन का सामना नहीं कर पाई। सोनिया गांधी अपने आसपास छा गए लोगों से मजबूर थीं।
उनका जब इतिहास लिखा जाएगा तो वह बहुत मार्मिक मगर साहस और संकल्प का इतिहास होगा। असाधारण प्रतिकूल परिस्थितियों में कैसे उन्होंने महिला बिल पास करवाया। किसान कर्ज माफी की। मनरेगा लाईं। क्या कांग्रेस के बड़े नेता जो उन्हें चारों तरफ से घेरे हुए थे इसके समर्थक थे? बिल्कुल नहीं। मगर सोनिया की ईमानदारी थी जो उन्होंने जनता से किए अपने वादे निभाए। सोनिया बहुत सहनशक्ति वाली गंभीर अध्यक्ष थीं। कभी कहती नहीं थीं। मगर महिला बिल पर बोलीं कि मैं जानती हूं कि मेरी अपनी पार्टी के लोग भी इसके विरोध में हैं। मगर महिला सशक्तिकरण उपर से लागू करना बहुत जरूरी है तभी वह नीचे तक पहुंचेगा।
बात अडानी की शुरू हुई थी मगर पहुंच यहां तक गई। मगर यह एक सिलसिला है। जैसे अडानी 2014 के बाद धूमकेतू की तरह चमके वैसे ही 2004 के बाद कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं ने दूसरे उद्योगपतियों को चमकाया था। बस इसमें फर्क यह है कि कोई उद्योगपति सोनिया के पास नहीं पहुंच पाया। हमें याद है देश के एक सबसे बड़े मीडिया मालिक पूरे दस साल कोशिश करते रहे मगर सोनिया उनसे नहीं मिलीं। और उससे भी पहले सहारा गु्रप जब देश में छाया हुआ था अमिताभ बच्चन उसके दरवाजे पर खड़े होकर मेहमानों की अगवानी करते थे तब उनके यहां हुई सदी की शादी में भी सोनिया नहीं गईं। वे विपक्ष में थीं। प्रधानमंत्री वाजपेयी, उपप्रधानमंत्री आडवानी सब गए थे। बहुत कोशिश की गई थी कि सोनिया जो कांग्रेस अध्यक्ष थीं न आएं तो राहुल या प्रियंका ही आ जाएं। मगर कोई नहीं गया। एक संदेश होता है। तड़क भड़क, पैसे का खेल दिखाने वाले समारोह से दूर रहकर जनता को यह बताने का कि सबको इसका हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। खुद नेहरू गांधी परिवार के यहां सब शादियां सादगी से होती रही हैं। केवल निकट मित्रों और संबंधियों की मौजूदगी में।
ऐसे ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बड़े न्यूज चैनल के मालिक संपादक को अपनी प्रेस कान्फ्रेंस में इसलिए नहीं बुलाया कि वह सांप, बिच्छु, स्वर्ग तक सीढ़ी और पता नहीं क्या क्या न्यूज के नाम पर दिखाते थे। सोनिया और मनमोहन सिंह दोनों अपनी अपनी जगह बहुत मजबूत फैसले लेने वाले थे। लेकिन उनके आसपास के लोगो के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनके कोई बड़े सिद्दांत, आदर्श नहीं थे। प्रणव मुखर्जी के कंधे पर हाथ रखकर चलते हुए उनसे बहुत छोटी उम्र के अनिल अंबानी का फोटो सामने आया ही था। वह भी शादी ही थी।
कारपोरेट ने उस वक्त भी फायदा उठाया और आज भी उठा रहा है। मगर फर्क यह है कि पहले सबको समान अवसर मिलता था। एक दो को थोड़ा बहुत ज्यादा मिलता था। मगर थोड़ा बहुत ही। सब एक दो के हिस्से में नहीं चला जाता था। मगर आज जैसा कि राहुल कहते हैं क्रोनी कैपटलिज्म है। वे तो दो का नाम लेकर कहते हैं कि सब अंबानी अडानी को दिया जा रहा है।
लेकिन अब लगता है राहुल को नई शब्दावली यूज करना पड़ेगी। एक का जैसा समर्थन सरकार कर रही है उससे लगता है दूसरा भी पीछे छूट गया। राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में यह कहा भी जा रहा है कि जिस दिन से अडानी ने अंबानी के मीडिया क्षेत्र में टेकओवर शुरू किया उनके पतन की कहनी शुरू हो गई। जैसा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट में कहा गया है कि अडानी का बिजनेस फाल्स आधारों पर खड़ा किया गया। दुनिया के नंबर दो उद्योगपति बनने के लिए आपके पास कोई नया प्रोडक्ट, आइडिया होना चाहिए। मगर अडानी ने केवल बैंकों और एलआईसी से कर्ज ले लेकर सरकारी उपक्रमों और मीडिया हाऊसों पर कब्जा किया। कहा जाता है कि अंडर वर्ल्ड ओवर वर्ल्ड किसी भी क्षेत्र में एक घर तो सब छोड़ते हैं। मगर अडानी ने एनडीटीवी को कब्जाया जिसमें अंबानी का भी पैसा लगा हुआ था। अंबानी अब पहले जैसे अंबानी नहीं रहे। उन्होंने अपनी नींव मजबूत कर ली है। और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अडानी से ज्यादा साख भी अर्जित कर ली है।
आज बात को डाइवर्ट करने के लिए कभी राहुल कभी लेफ्ट पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि इन्होंने अडानी का जहाज डूबोया। मगर आर्थिक क्षेत्रों में कहा जा रहा है कि नींव तो पहले ही कमजोर थी और फिर दूसरे के क्षेत्र में दखलंदाजी करने से और हिल गई। अभी तक अडानी बंदरगाह, खनन और दूसरे क्षेत्रों में थे। अंबानी दूसरे क्षेत्रों में। जिनमें मीडिया भी था। मगर मीडिया में अडानी का आना उनके लिए घातक हो गया। इसका संदेश स्पष्ट है। जो राहुल ने कहा कि हम कारपोरेट के विरोध में नहीं हैं। एक या दो पूंजीपतियों को सब कुछ सौंप देने के विरोध में हैं। देश में बहुत सारे उद्यमी हैं। जिन्होंने अपने खतरे उठाने के क्षमता, मेहनत और लगन से बड़े उद्योग खड़े किए हैं।
आज से पचासों साल पहले से। डोरी लोटा लेकर निकले मारवाड़ियों से लेकर जैनी, पंजाबी, गुजराती सबने अपने साहस के दम पर विकास किया है। सरकारी संरक्षण की कहानी तो बहुत बाद में शुरू हुई। धीरूभाई अंबानी से। मगर अब उनके बेटे मुकेश ने भी औद्योगिक आधार मजबूत कर लिया है। ऐसा ही देश में टाटा, बिरला, बजाज, डालमिया, और बहुत सारे उद्योगपतियों का है। सबको समान अवसर मिलना चाहिए। ओपन काम्पटिशन होना चाहिए। न किसी के सिर पर हाथ होना चाहिए न किसी के पांव खींचना चाहिए। देश के लिए औद्योगिक विकास के लिए यह जरूरी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)